“कृष्णानगर की पारंपरिक जगद्धात्री पूजा विश्वप्रसिद्ध है और पूजा के उपरांत विसर्जन की परंपरा और शोभायात्रा को लेकर भी विशेष आकर्षण रहता है”
नदिया 02 / 11 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट
घट विसर्जन के साथ कृष्णानगर में हर साल की तरह इस साल भी शहर के कई प्रसिद्ध बारोवारी (सामुदायिक) पंडालों की प्रतिमाओं ने राजबाड़ी की ओर अपनी यात्रा शुरू की।
परंपरा है कि राजबाड़ी में देवी के दर्शन करवाने के बाद ही ये प्रतिमाएं अंततः कृष्णानगर के कदमतला घाट की ओर रवाना होती हैं जहाँ उनका विसर्जन किया जाता है। इस परंपरा को निभाते हुए मूर्तियों का विसर्जन किया गया।
इस शोभायात्रा को देखने के लिए कृष्णानगर के मुख्य मार्गों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। कृष्णानगर की जगद्धात्री पूजा का एक विशेष आकर्षण ‘सांग’ प्रथा है।
जहां प्रतिमाओं को बांस के ढांचों पर बांधकर पुरुष बेहारों (पालकी ढोने वाले) द्वारा कंधों पर उठाकर पूजा पंडाल से गंगा घाट तक ले जाया जाता है। यह प्राचीन परंपरा आज भी शहर की विरासत को जीवित रखे हुए है।
हालांकि इस वर्ष की शोभायात्रा का सबसे खास आकर्षण घूर्णी हालदारपाड़ा बारोवारी पूजा रही। इस बारोवारी पूजा ने सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए पारंपरिक पुरुष बेहारों की जगह मुहल्ले की महिलाओं को प्रतिमा ढोने की जिम्मेदारी सौंपी।
नारी शक्ति के इस असाधारण प्रदर्शन को देखकर पूरा शहर अभिभूत हो गया। शोभायात्रा के मार्ग पर पुरुष और महिला दोनों ने तालियां बजाकर और जयकार करके उनका स्वागत और अभिनंदन किया।
इस प्रकार, कृष्णानगर की जगद्धात्री पूजा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यह त्योहार परंपरा, भक्ति और सामाजिक परिवर्तन का एक अद्भुत संगम है। शोभायात्रा में शहर की कई प्रसिद्ध प्रतिमाएं शामिल थीं जिनमें बूढ़ी मां, छोटी मां, बाघडांगा, नूरीपाड़ा, मालोपाड़ा और गुलाबपट्टी की प्रतिमाएं प्रमुख थीं।
