“राजधानी से सटे शिमला ग्रामीण के हलोग धामी में दिवाली के दूसरे दिन मंगलवार को ‘पत्थर के खेल’ की पौराणिक देव परंपरा के इस खेल का आयोजन किया गया”
शिमला 22 / 10 / 2025 संतोष सेठ की रिपोर्ट
धामी में ‘खेल का चौरा’ नामक स्थान पर घाटी के दोनों ओर से जमोगी और कटेड़ू टोलियों के बीच जमकर पत्थरों की बरसात हुई।
चार बजे से लेकर 4:40 तक हुए इस खेल में कटेड़ू टोली के सुभाष के हाथ में पत्थर लगा। परंपरा के अनुसार उसके खून से खेल का चौरा में स्थित मां भद्रकाली के मंदिर में तिलक कर पत्थर का खेल संपन्न हुआ।
पत्थर लगने पर मौजूद सैकड़ों लोग ढोल नगाड़ों की थाप पर एक साथ थिरकते रहे। शिमला से 35 किलोमीटर दूर धामी के खेल का चौरा में करीब तीन बजे राज परिवार के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह, पुजारी तनुज और राकेश शर्मा की पूजा अर्चना और पूजा के फूल लेकर ढोल नगाड़ों के साथ शोभा यात्रा निकली गई।
शोभा यात्रा में पुष्पेंद्र सिंह, दुर्गेश सिंह, रणजीत सिंह, चेतराम, लेख राम, बाबु राम, प्रकाश, हेत राम , प्रकाश नील सहित अन्य लोग 3:40 बजे सती का शारड़ा स्मारक पर पहुंचे।
माथा टेकने के बाद झंडा लहराने के आयोजकों के इशारे के साथ ही घाटी के एक ओर एकत्र जमोगी, और दूसरी ओर कटेड़ू टोली के लोगों न पत्थर बरसाना शुरू कर दिया।
करीब 4:40 पर कटेड़ू टोली की ओर से सुभाष के हाथ में पत्थर लगने पर खेल को आयोजकों ने रोकने का इशारा किया।
समारक पर मत्था टेका गया, इसके बाद पहाड़ी पर बने भद्रकाली के मंदिर में तिलक कर परंपरा को पूरा किया गया। इसके बाद सुभाष को प्राथमिक उपचार दिया गया।
बता दें कि जमोगी और कटेड़ू टोलियां इस खेल में आमने सामने होती है। जमोगी के खूंदों की ओर से जनिया, जमोगी, प्लानिया, कोठी, चईंयां, ओखरू गांव के लोग शामिल होते है।
वहीं कटेड़ू राज परिवार की ओर से टोली में तुनड़ू, धगोई, बठमाणा और इसके आसपास के गांव के युवा शामिल होते हैं।
नर बलि के विकल्प के रूप में शुरू हुई थी प्रथा
राज परिवार के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह ने बताया कि सदियों पूर्व राज परिवार की राज माता ने मानव बलि के विकल्प के रूप में इस खेल को शुरू किया था, जिससे क्षेत्र की जनता पर कोई संकट न आए।
इस विकल्प में खेल में चोट लगने पर निकलने वाले खून से भद्रकाली के खेल का चौरा में बने मंदिर में तिलक किया जाने लगा।
तब से यह लगातार प्रथा चलती आ रही है। कोरोना में जगदीप सिंह ने अपने खून से भद्रकाली को तिलक कर इस प्रथा को टूटने नहीं दिया।
